राष्ट्रीय

दिल्ली भाजपा में जमीनी और पुराने वर्करों की उपेक्षा ? क्या यह भी कांग्रेस की राह पर चल रही है?
दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/दिल्ली में अभी स्थानीय स्तर पर मंडलों व जिलाअध्यक्षों की नियुक्ति की गई है।इन नियुक्तियों से कई जगह पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में रोष भी है और वह दबी जुबान में अपनी उपेक्षा का दर्द को व्यक्त कर रहे हैं। नाम न उजागर करने की शर्त पर इन्होंने कहा कि वास्तविकता तो यह है कि भाजपा के कठिन समय में जिन लोगों ने पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत की,कष्ट झेले,पुलिस की लाठियां खाई,जेल गए और अपने परिवार को भी आर्थिक संकटों में डाल दिया,आज जब पार्टी को सत्ता मिल गई तो कौन पूछता है उन पुराने कार्यकर्ताओं को?आज जो नेता येन-केन-प्रकारेण किसी पद पर विराजमान होने में सफल हो जाते है,उसके इर्द-गिर्द चापलूसों की घेराबंदी हो जाती है।मजेदार बात तो यह है कि जो लोग विधायक और निगम पार्षद बन चुके हैं,उनमें से अधिकांश के चहेते या तो बिल्डर माफिया हैं या उन्होंने अपने चहेतों को बिल्डर बना लिया है।यही बिल्डर माफिया और सट्टेबाज ही आज भाजपा के कर्मठ कार्यकर्त्ता बनकर घूम रहे हैं और इसका परिणाम सामने है।दिल्ली में कई दशक बीतने के बाद भी भाजपा सत्ता में नहीं लौट सकी है। इस स्थिति में भाजपा का निकट भविष्य यानि अगले चुनाव में भी दिल्ली की सत्ता पर आधिपत्य होता दिखाई नहीं दे रहा।निगम पार्षद,विधायक हो या सांसद जनता की तो छोड़ो अपने कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में भी शामिल नहीं होते हैं, इस बात को सभी जानते हैं।कांग्रेस की राह पर चल रही दिल्ली की इकाई को यह नहीं समझ आ रहा कि पार्टी संगठन में जमीनी कार्यकर्ताओं को तरजीह देने से ही पार्टी को लाभ होगा ना कि अपने करीबी नाकारा चंपुओं को पदों पर बैठाने से। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बात को जितना जल्दी समझ ले तो पार्टी का हित ही होगा अन्यथा कांग्रेस का हश्र देख लो जीता-जागता उदाहरण सभी के सामने है।
 
बंटवारे के दोषी सत्तालोलुप नेताओं को शांतिदूतऔरआधुनिक भारत का निर्माता कैसे माना जाए?
दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/आज 15 अगस्त है।आज से 73 वर्ष पूर्व जहां भारत को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति मिली वहीं भारत को विभाजन का दर्द भी मिला। देश को धार्मिक हिन्दू- मुस्लिम आधार पर दो टुकड़ों में विभाजित करवाने के जिम्मेदार नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना को जहां राजसत्ता मिली वहीं करोड़ों लोगों को अपने ही देश में शरणार्थी बन जाने कीअंतहीन पीड़ा मिली। जहां भारत को विदेशी शासन से मुक्त होने की खुशी तो मिली परंतु, देश को विभाजन का दर्द भी मिला।उस समय के कांग्रेस के नेता सत्ता पाने की लालसा में इतने स्वार्थी हो गए थे कि उन्होंने देश के विभाजन के पाप को भी कर डाला। भारत के विभाजन के दोषी कांग्रेस, नेहरू और जिन्ना ही माने जाएंगे। विभाजन के कारण करोड़ों लोगों को अपनी जन्मभूमि को छोड़ने को मजबूर कर दिया गया। जेहादियों ने हजारों लड़कियों की अस्मत को लूटा और उनकी हत्या भी कर डाली।विभाजन की आग में लगभग 15 लाख निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह आजादी लाखों लोगों के खून से रंगकर आईं । कांग्रेस ने विभाजन के महापाप के साथ -साथ अपनी सत्ता को आज़ादी के बाद भी चिरकाल तक बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बजाए भारत में ही रोक कर हमेशा के लिए नासूर पैदा कर दिया। इसी के साथ ही मुस्लिमों को अपना वोट बैंक बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को अपनाकर देश का बहुत नुकसान किया। जिन परिवारों ने इस आजादी के कारण अपने सगे -संबंधियों की अपनी आंखों के सामने हत्या को देखा , अपने घर बाहर छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी बनने का अपमान सहना पड़ा,वो इस दिन को कैसे खुशी का दिन माने? देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार नेहरू - जिन्ना भारत और पाकिस्तान के मसीहा और भाग्यविधाता बन गए। अब यह सोचने का विषय है कि ऐसे सत्तालोलूप नेहरू को जिसने सत्ता के लिए देश का बंटवारा करवाया कैसे शांतिदूत और आधुनिक भारत का निर्माता माना जा सकता है। हम विभाजन की त्रासदी में मारे गए बेकसूर लोगों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है। (वॉयस ऑफ भारत)
 
श्रीराम मंदिर निर्माण ही हमाराअंतिम लक्ष्य नहीं l अपना धर्म/संस्कृति बचाने का संघर्ष जारी रहेगा।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/हमारा सदियों से चलता आ रहा देव स्थान मुक्ति अभियान राम मंदिर के निर्माण तक ही नहीं रुकना चाहिए। पिछली कई शताब्दियों से हमारी संस्कृति और सभ्यता को नष्ट- भ्रष्ट करनेवाली राक्षसी ताकतें आज भी हमें समूल समाप्त करने की साजिशों में लगी हैं। श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए हम लगभग पांच सौ साल तक लडे और लाखों लोगों ने अपना जीवन भी कुर्बान कर दिया ,तब जाकर हम कोर्ट से इसको मुक्त करवाने में सफल हुए। यह हमारी पहली विजय है और यही विजय यात्रा हमको मथुरा में श्री कृष्ण जन्मभूमि और काशी में बाबा विश्वनाथ सहित अन्य देव स्थानों को मुक्त करवाने तक जारी रखनी होगी। हमारा संकल्प दृढ़ रहना चाहिए और संघर्ष करने की शक्ति क्षीण नहीं होनी चाहिए। श्री राम मंदिर के निर्माण के प्रारम्भ होने के साथ ही जो अधर्मी ताकतें इसको ध्वस्त करने की धमकियां दे रही हैं, उनके मजहब ने उन्हें यही सिखाया है कि दूसरे धर्मों को तलवार के बल पर ख़तम कर दो और उनके देवालयों को तोड़कर अपनी इबादतगाह बना डालो। हम और हमारा धर्म बेशक हमें दूसरों का अपमान और उन पर अन्याय करने की शिक्षा नहीं देता पर हमें अपमान और अन्याय सहकर चुप बैठने को भी नहीं कहता। अधर्मी और अन्यायी ताकतों से हमारे देवी- देवता और अवतार अपने -अपने समय में उनसे लडे भी और उनका विनाश भी करके माने। हमारे दिल में अगर अपने देवताओं और अपने अवतारों-श्री राम-श्री कृष्ण के प्रति तनिक भी श्रद्धा है तो,हमें भी इन आसुरी शक्तियों और हिंसक ताकतों से लडना ही होगा ।अपना धर्म, राष्ट्र और संस्कृति को बचाने का हमारा जो संघर्ष पिछले 13 सौ वर्षों से चल रहा है, उसको भविष्य में भी अनवरत तब तक जारी रखना होगा जब तक इन अत्याचारी, हिंसक और अधर्मी आसुरी ताकतों का हम समूल नाश न कर देते। इसी में हमारी श्री राम की आराधना है, इसी में श्री की भक्ति है और इसी में भोले बाबा की पूजा है। जय भवानी ।जय श्री राम। जय श्री कृष्णा। ओम नमो शिवाय।( वॉयस ऑफ भारत)
 
यह कत्ल है या कुर्बानी ? बेजुबान निरिह जीवों की हत्या को हम कैसे मुबारक कहें?
दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/इसे कुर्बानी कहे या कत्ल?हमारी समझ में यह नही आता कि हम बेजुबान,निरिह और मासूम जानवरों का बेरहमी से किए गए कत्ल को मुबारक कैसे माने ?किसी को भी किसी की जान लेने की इजाजत नहीं है, फिर भी किसी को खुश करने के लिए एक ही दिन में करोड़ों जानवरों को मौत के घाट उतार कर हम खुशी मनाते हैंऔर इस काम को पुण्य कार्य सम्झते हैं।यह तो सार्वभौमिक सच्चाई है कि कुर्बानी हमेशा से कमजोरों की ही दी जाती रही है। क्या कभी शेर की कुर्बानी देने की हिमाकत कोई कर सकता है? तो इसका जवाब न में ही होगा। कुर्बानी के नाम पर किए गए कत्लों को आप कुछ भी कहें, लेकिन हम तो इसे कमजोर बेजुबान जीवों के प्रति किया गया अपराध ही कहेंगे। जो लोग और संगठन जीवों पर किए जाने वाले अत्याचार पर हो हल्ला मचाते हैं और मीडिया भी दिवाली पर की गई आतिश्बाज़ी को वायु प्रदुषण कह कर शोर मचाता है और बेजुबान जानवरों को कत्ल किए जाने पर उनको साँप क्यों सूंघ जाता है ?कथित रूप से खुद को सर्वशक्तिमान कहलवाने वाला अपनी बनाई सृष्टि के कमजोरों का रक्त बहाने से खुश होता है,तो अंदाज़ा अपनी बुद्धि से लगा लो कि वह कैसे सृष्टि निर्माता होगा? खैर हम तो हिंसा में विश्वास नहीं रखते क्योंकि हमारी संस्कृति और धर्म में ऐसा हमको नहीं सिखाया गया है।
 
जलियांवाले नरसंहार के दोषी डायर को21 वर्ष बाद उसके घर में सजा देनेवाले उधम सिंह के हम सदा ऋणी रहेंगे।
दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/भारत मां के वीर सपूत शहीद सरदार उधम सिंह जी की पुण्यतिथि पर उनके चरणों में हमारा शत शत नमन। भारत के इस सपूत ने अमृतसर के जलियां वाले बाग में निहत्थे भारतीयों के नरसंहार करवाने वाले पंजाब के गवर्नर जनरल माईकल ओ डायरअंग्रेज को लंदन में उसके घर में जाकर मौत के घाट उतार दिया था। जलियां वाले बाग में मारे गए सैंकड़ों अपने बहिन -भाइयों की नृशंस हत्या का बदला लिया था। इस वीर सपूत का भारतीय समाज सदैव ऋणी रहेगा। सरदार उधमसिंह 13अप्रैल, 1919को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा। उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च ,1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून ,1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।(वॉयस ऑफ भारत)
 
राममंदिर से मुस्लिमों को दूर रखा जाए। हिन्दुओं ने दी है बड़ी कीमत। इसमें मुस्लिमों का क्या योगदान?
दिल्ली (अश्विनी भाटिया ) /भगवान श्री राम जी के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण हेतु आगामी5 अगस्त को भूमि पूजन के कार्यक्रम की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। कोरोना वायरस के चलते इस ऐतिहासिक समारोह में चाहते हुए भी बहुत से लोग शामिल नहीं हो पाएंगे। कार्यक्रम सीमित अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों द्वारा संपन्न होगा। सोशल मीडिया में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कोई मुस्लिम भी पैदल राम जी की ननिहाल से मिट्टी लेकर आ रहा है जो पूजन में शामिल होगा और उसके द्वारा लाई गई मिट्टी नीव में डाली जाएगी। हमें यह समझ नहीं आ रहा कि सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने का पूरा बोझ यह हिन्दू अपने सिर पर ही क्यों लिए फिरता है? इस बात को पूरा विश्व जानता है कि हिन्दुओं ने अपने आराध्य श्री राम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिए पिछले5 सौ वर्ष संघर्ष किया और लाखों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी। जेहादी आतंकी मुस्लिमों ने इस पवित्र मन्दिर को बाबर के निर्देश पर 5 सौ वर्ष पूर्व ध्वस्त करके इस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कर लिया था। काफी संघर्षों के बाद1992 में हिन्दुओं बाबरी नामक कलंक को साफ कर दिया। कई दशकों तक कानूनी लड़ाई इस मंदिर के निर्माण हेतु हिन्दुओं ने लड़ी है और मुसलमानों ने हर कदम पर इसकी राह में बाधाएं ही उत्पन्न की। कुछ कट्टरपंथी आतंकी मुस्लिमों ने खून खराबा करने तक की धमकियां भी दी। मुस्लिमों को हिन्दू समाज ने कई बार इस बात का प्रस्ताव भी दिया कि वह इस पवित्र भूमि से अपना दावा छोड़ दें तो हिन्दू उनको दूसरी जगह अपने खर्चे से विशाल मस्जिद बनाकर दे देंगे। परंतु इस कट्टर मुस्लिम संप्रदाय ने कोई उदारता का परिचय नहीं दिया और हर संभव कोशिश की कि यह पवित्र भूमि हिन्दुओं को न मिले।अंत में देश के सर्वोच्च न्यायालय से हिन्दू पक्ष केस जीतकर मन्दिर निर्माण की राह प्रशस्त कर पाया है, इसमें मुस्लिमों का कोई भी योगदान नहीं है। जिस भी मुस्लिम को श्री राम में आस्था है और वह खुद को उनका भक्त समझता है तो वह सर्वप्रथम इस्लाम की त्याग कर सनातन धर्म में वापसी करे और प्रमाण दे कि उसे राम में आस्था है। जिस मजहब में अल्लाह के अलावा कोई दूसरा पूजनीय नहीं हो सकता और जो अपने अनुयायियों को मूर्तियों को तोड़ने का आदेश देता हो उसके अनुयायियों की आस्था मन्दिर में नहीं हो सकती। ऐसी मजहबी शिक्षा पर चलने वाले मुस्लिमों को मन्दिर निर्माण में शामिल करके इतिहास में जगह देने की किसी भी कोशिश को हिन्दू समाज सहन नहीं कर सकता। श्री राम मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी निभानेवाली समिति/न्यास और भूमिपूजन समारोह के आयोजकों को भूमि पूजन से मुस्लिमों को दूर रखना चाहिए। ज्यादा उदारता हमारी कमजोरी बनी। जिस मुस्लिम की राम में आस्था है तो पहले उसे हिन्दू बनाओ और फिर उसको भूमि पूजन में शामिल होने का अवसर दो। यह बात हिन्दू समुदाय सहन नहीं कर सकता कि मन्दिर मुक्ति संघर्ष में गोली खाएं हिन्दू, जेल जाए हिन्दू और भूमि पूजन में इतिहास में नाम दर्ज करवाएं मुस्लिम जिनका मन्दिर के आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। अब हमारे कुछ नेताओं और धर्माचार्यों को अगर हिन्दुओं को उदार साबित करने का पाखंड करना है तो हम सब उसके खिलाफ हैं। (वॉयस ऑफ भारत)
 
दिल्ली सिविल डिफेंस में शामिलआप के वर्करों की उच्चस्तरीय जांच जरूरी है।
दिल्ली(अश्विनी भाटिया) /विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार जब भी वजूद में आई तब ही उसने दिल्ली सिविल डिफेंस में बड़ी संख्या में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भर्ती किया। पिछले7-8 वर्षों में दिल्ली सिविल डिफेंस में की गई इस पूरी भर्ती की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। इस बात की पूरी संभावना है कि आप की सरकार ने दिल्ली सिविल डिफेंस में को वायलेंटियर शामिल किए हैं,उनमें से अधिकांश आप पार्टी के वर्कर ही हैं। जानकर सूत्रों का कहना तो यह भी है कि सिविल डिफेंस के नाम पर आप पार्टी ने एक वर्दीधारी फोर्स बनाकर अपनी राजनैतिक पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया है। यह फोर्स वेतन तो सरकार से पाती है और इसकी निष्ठा आम आदमी पार्टी से जुड़ी हुई है। सूत्र तो यह भी कहते हैं कि इसीलिए पश्चिमी दिल्ली सब-डिवीजन कार्यालय में तैनात सिविल डिफेंस के जिस वायलेंटियर की कोरोना संक्रमण से मौत हुई, उसको केजरीवाल ने सरकारी खजाने से एक करोड़ रुपए की सहायता राशि उसके घर वालों को दी। अब सवाल यह उठना आवश्यक है कि क्या सिविल डिफेंस कानूनी रूप से सशस्त्र पुलिस या अर्धसैनिक बल की श्रेणी में आता है जो उसके वयलेंटियर को पुलिस फोर्स के कर्मी की तरह इतनी बड़ी सहायता राशि सरकारी खजाने से दी गई? दिल्ली में सरकारी और अनुबंधित बसों में मार्शल लगाने की आढ़ में भी चुन -चुनकर आप के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की ही भर्ती की गई है। इस तरह से आप ने एक तीर से कई निशाने किए और अपना राजनैतिक उल्लू भी सीधा कर लिया। इससे एक तो जिस कार्यकर्त्ता को नौकरी मिली वह खुश हो गया और दूसरे वह और उसका परिवार हमेशा के लिए पार्टी निष्ठावान हो गया।अधिकांश दिल्ली सरकार और नगर निगम के कार्यालयों से लेकर तमाम अस्पतालों तक में सुरक्षा के नाम पर यही सिविल डिफेंस के वॉयलेंटियर ही लगाए गए हैं,जो देखने में पुलिस का प्रतिरूप हैं और यह अब केजरीवाल की निजी पुलिस का विकल्प बन चुके हैं। दिल्ली में संवैधानिक रूप से पुलिस केंद्र के अधीन है और केजरीवाल को इस बात की शुरू से कसक रही कि पुलिस उसके अधीन आनी चाहिए। इसीलिए उसने कई बार कई राजनैतिक व कानूनी प्रपंच भी किए ,लेकिन वो कामयाब नहीं हुए। बाद में इस पार्टी के थिंक टैंक ने दिल्ली सिविल डिफेंस को अपनी पुलिस के रूप में वजूद में लाने की योजना बनाई और उसमें जी भरकर अपने कार्यकर्ताओं की भर्ती करके एक वर्दीधारी फोर्स खड़ी कर ली है। इसमें कई वायलेंटियर तो ऐसे हैं जो अधिकारियों के दलाली भी करते हैं और उनके विरूद्ध कोर्ट में आपराधिक केस भी विचाराधीन हैं।सिविल डिफेंस के नाम पर खड़ी की गई यह फोर्स आम नागरिकों के लिए कम और आम आदमी पार्टी के राजनैतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए अधिक इस्तेमाल की जाती है। अत: अब न्याय के पक्ष में दिल्ली सिविल डिफेंस की उपराज्यपाल को अविलंब उच्च जांच एजेंसी की जांच करवाकर इसके राजनीतिकरण को समाप्त करके नागरिकों का सेवा बल बनाना चाहिए।
 
कब तक आम आदमी अपनी जान और आबरू को बचाने के लिए गुंडों के हाथों मरता रहेगा?
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/बहुत दुखद। बदमाशों को अपनी भांजी से छेड़खानी से रोकने की सजा पत्रकार विक्रम जोशी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। बदमाशों ने सरेआम जोशी को गोलियों से भून डाला। राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के विजयनगर इलाके में बदमाशों के हमले में घायल हुए पत्रकार विक्रम जोशी की मंगलवार देर रात इलाज के दौरान मौत हो गई। बीते सोमवार की रात बदमाशों ने उनके सिर में गोली मार दी थी। गोली मारने से पहले बदमाशों ने पत्रकार को बुरी तरह पीटा भी था। वारदात के वक्त बाइक पर पत्रकार की दो बेटियां भी बैठी थीं। फिलहाल इस मामले में पुलिस ने अब तक नौ आरोपियों को गिरफ्तार किया है।पत्रकार विक्रम जोशी के भाई अनिकेत के मुताबिक रविवार की रात करीब 10:30 बजे उनका भाई अपनी दो बेटियों के साथ बाइक से घर जा रहे थे। माता कॉलोनी में अग्रवाल स्वीट्स के पास छोटू पुत्र कमालुद्दीन, आकाश विहारी और रवि पुत्र मातादीन अपने कुछ साथियों के साथ आए और उनके भाई के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसके बाद आरोपियों में से छोटू ने तमंचा निकालकर विक्रम के सिर में गोली मार दी। गोली लगने से उनका भाई लहूलुहान होकर जमीन पर गिर गए। आनन फानन में उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां मंगलवार देर रात उनकी मौत हो गई। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के सभी दावों के बावजूद यूपी की कानून व्यवस्था नहीं सुधर रही। बदमाशों के हौंसले बुलंद हैं। किसी भी नागरिक की जान और उसकी आबरू को तार तार करनेवाले असामाजिक तत्त्वों का ईलाज क्या है? क्योंकि हमारा कानून इतना लचीला है जिसमें आरोपी आराम से बचकर निकल जाता है। लोगों को कब तक अपनी बहिन बेटियों की अस्मत बचाने के लिए अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। समाज के अंदर छुपे हुए बदमाश जितने खतरनाक है उनसे ज्यादा उनको संरक्षण देने वाले सभ्य समाज के लिए ख़तरा बन चुके हैं। इनका ईलाज कौन करेगा? (वॉयस ऑफ भारत)
 
अलवर:जिलाधीश और एस पी पदों पर तैनात हुई महिला अधिकारियों को कड़ी चुनौतियों से निपटना होगा।।
अलवर (अश्विनी भाटिया)/राजस्थान के अलवर जिले की कमान अब महिला अधिकारियों के हाथ में सौंप दी गई है। राज्य सरकार ने जहां जिले के जिलाधीश पद पर 2007 बैच की आईएएस अधिकारी आंनदी को नियुक्त किया है, वहीं पुलिस अधीक्षक के पद की जिम्मेदारी 2013 बैच की भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी तेजस्विनी गौतम को सौंपी है। अलवर पूर्वी राजस्थान का सबसे महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्तर्गत आनेवाला जिला है। हरियाणा के मेवात के साथ लगते इस जिले को कानून- व्यवस्था की दृष्टि से भी एक चुनौतपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराधों,अवैध खनन, चोरी,तस्करी और आर्थिक धोखाधड़ी के मामलों की अधिकता के कारण यह क्षेत्र कई बार सुर्खियों में आ चुका है। दूसरी ओर मनरेगा ,राशनिंग वितरण में धांधली से लेकर पेयजल संकट से जनता को निजात दिलाना और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना जिलाधीश महोदया के लिए गंभीर चुनौती रहेगी।किसी भी जिले में सिविल और पुलिस प्रशासन को संभालने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक की ही होती है। अगर जिले के इन दोनों पदों की कमान कुशल और तेजतर्रार अधिकारियों के हाथ में हो तो वहां की जनता को सरकार द्वारा दी जा रही कल्याणकारी योजनाओं का लाभ और सुरक्षित वातावरण में जीवन व्यतीत करने का सुखद आंनद मिलता है
 
दुशमनों के साथ सीमा पर तो सेना लड़ेगी पर देश के अंदर आर्थिक मोर्चे पर हमें लड़ना होगा।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/इस समय हमारा देश बहुत ही चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। हमें एक ओर जहां कोरोना जैसी महामारी से जूझना पड़ रहा है ,वहीं दूसरी ओर देश के दुश्मन चीन और पाकिस्तान हमारी सीमाओं पर हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हैं। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए और चीनी सैनिकों के धोखेबाजी का मुकाबला करते हुए हमारे देश के 20 जवान शहीद हो गए हैं ।हमारे जवानों ने बड़ी वीरता से दुशमनों का मुकाबला किया और काफ़ी संख्या में उनको भी मारा डाला।हमारे समस्त देशवासियों का भी यह कर्तव्य है कि हम भी इस घड़ी में देश के स्वाभिमान और इसकी एकता- अखंडता को सुरक्षित रखने हेतु चीन को मुंह तोड़ जवाब दे। सीमा पर तो दुश्मन से हमारी सेना निपट ही लेगी ,लेकिन हमें देश के अंदर चीन को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर करना होगा। चीन हमारे देश में बड़ी मात्रा में अपना सामान बेचकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करके उस पैसे को हमारे विरूद्ध सीमा पर कर रहा है।अत हमें अभी से यह संकल्प ले लेना चाहिए कि हम चीन की बनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर दें। हम चीन को आर्थिक रूप से कमजोर करके उसके नापाक मंसूबों को तहस- नहस कर सकते हैं।चीन इलेल्ट्रोनिक और आई टी क्षेत्र में भी बहुत बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है। बहुत से सॉफ्ट और हार्ड वेयर/ फोन एप आदि का भी हम अपने फोन में प्रयोग करके चीन को मजबूत बना रहे हैं। हमें इन फोन एप आदि को अपने मोबाईल से बाहर कर देना चाहिए। आजकल बहुत से लोग टिक टोक (जो कि चीन का ही एप है)बहुत इस्तेमाल करके खुद की अदृश्य कला को प्रदर्शित करने में दिन -रात लगे हुए हैं ,हम उसको भी तुरन्त बन्द करें। सभी देशवासी भी चीनी एप से बनी किसी वीडियो आदि को बनाना बंद कर दें।अगर कोई अब भी चीनी एप को अपनाता है तो वह अपने देश को नुकसान पहुंचाने का ही काम करता है। सभी नागरिकों को भी हमें इस बात को लेकर जागरूक रहना होगा कि कौन सी वीडियो चीनी एप से बनाकर हमारे को मैसेज से भेजी जा रही है,हम तुरन्त इसको निरस्त करें और भेजनेवाले को भी ऐसा न करने को कहें। जो नागरिक इस आग्रह के बावजूद भी चीनी प्रेम दिखाता है तो वह देश से द्रोह ही करता है,क्योंकि जो अपने देश का नहीं हो सकता वो किसी का नहीं हो सकता। हम मानते हैं कि बहुत लोग बड़ी मात्रा में चीनी वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहे हैं और उन पर निर्भर हो चुके हैं, लेकिन हमें अब आत्मनिर्भर होना होगा। हम अभी आत्मनिर्भर होने का संकल्प करके धीरे -धीरे चीनी अर्थव्यवस्था को समाप्त कर सकते हैं। देश और हमारी रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले भारत मां के वीर सपूतों का ऋण हम कभी नहीं उतार सकते हैं,लेकिन उनके चरणों में अपना नमन करके, उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि तो अर्पित कर ही सकते हैं। जय हिन्द। जय भवानी। भारत माता की जय।
 
विकट परिस्थितियों से लड़ने वाला ही होता है असली नायक ।पलायन कायरता की निशानी।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/रुपहले पर्दे पर नाटकीय जीवन जीना और वास्तविक जीवन जीने में जमीन- आसमान का अन्तर है। यह जरूरी नहीं है कि रंगमंच पर योद्धा और साहसी दिखनेवाले लोग अपने असल जीवन में भी वैसे ही हों।पर्दा किसी भी कलाकार को यश और धन तो दे सकता है ,लेकिन विपरीत परिस्थितियों में जीने का साहस और प्रबल इच्छाशक्ति नहीं । जीवन में आनेवाले उतार -चढ़ाव का सामना करनेवाला और प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करने वाला ही वास्तविक नायक होता है। उसका जीवन ही समाज के लिए आदर्श और अनुकरणीय होता है।उससे ही समाज के दूसरे लोगों को भी लडने और जीने की प्रेरणा मिलती है। जो लोग विकट परिस्थिति में अडिग रहकर उसका सामना नहीं कर पाते और उनसे पलायन करके या घबराकर अपने जीवन का अंत कर ले,वो कायर होते हैं। यह कायर और पलायनवादी न तो समाज के लिए आदर्श हो सकते हैं और न ही नायक । चकाचौंध में विलासिता पूर्ण जीवन जीने वाले इन भोगी कायर जीवों का जीवन अनुकरणीय नहीं होता।अत हमें भी ऐसे लोगों को अपना आदर्श मान कर अपना जीवन नरकीय नहीं बनाना चाहिए। साहसी और संघर्षशील साहसी व्यक्तियों का अनुकरण करने से ही हम सुखी और खुश रह सकते हैं। धन और यश हमें जीवन का वास्तविक आंनद नहीं दे सकता है और न ही संघर्ष करने की क्षमता।
 
दिल्ली के अस्पतालों में इलाज तो दूर पानी देनेवाला कोई नहीं।केंद्र सरकार कब तक मुक दर्शक बनी रहेगी?
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/ कोरोना से दिल्ली की बिगड़ी स्थिति को मुकदर्शक बनकर केंद्र सरकार को भी नहीं देखते रहना चाहिए। एक मक्कार,महाझूठे नौटंकीबाज मुख्यमंत्री के राहमो-करम पर जनता को छोड़ देने के कारण देश की राजधानी के लोग मौत के मुंह में जा रहे हैं जिनको बचाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की भी होती है।केंद्र सरकार को वरिष्ठ डाक्टरों के समूह से दिल्ली को अस्पतालों का निरीक्षण करवाकर सच को अविलंब सामने लाना चाहिए।केजरी सरकार के तो झूठे दावों की पोल खुल चुकी है।सरकार के नकारेपन ने लोगों को मौत के अंधेरे कुएं में धकेल दिया है। आज दिन-प्रतिदिन दिल्ली में कोरोना लोगों को अपना शिकार बनाकर उनकी जिंदगी को समाप्त कर रहा है। केजरी सरकार पूरी तरह से असफल और निकम्मी सरकार साबित हो चुकी है। हालात इतने बिगड़े पड़े हैं कि दिल्ली के शमशान भी दाह -संस्कार के लिए कम पड़ रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज तो दूर उन्हे पानी देनेवाला भी कोई नहीं है। निजी अस्पतालों में इलाज के लिए लाखों रुपए चाहिएं जो गरीब जनता के पास नहीं है।अगर केंद्र सरकार भी अपनी ड्यूटी नहीं निभाती तो सुप्रीम कोर्ट इस मामले का संज्ञान लेकर पहले अस्पतालों का निरीक्षण करवाए। अब सिर्फ गाल बजाने और एक दूसरे पर आरोप लगाने से लोगों का जीवन नहीं बचने वाला। यह बात तो पूरी तरह से साबित हो ही चुकी है कि दिल्ली सरकार ने सिर्फ झूठ बोला और करोड़ों रुपए प्रचार पर खर्च करके जनता को मौत के कुएं में धकेल दिया है। सरकारी अस्पतालों में जो कोरोना संक्रमितों की दयनीय स्थिति है और लाशों की दुर्दशा की जा रही वो इंसानियत को शर्मशार करने वाली है।(वॉयस ऑफ भारत)
 
दिल्ली में इलाज़ करने की बजाए नए शमशानों का हो रहा निर्माण। सरकार के सभी दावे झूठे?
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/ देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना ने अपना विकराल रूप धारण करना शुरू कर दिया है । दिल्ली के लोगों में हाहाकार मच रहा है। संक्रमितो की न जांच और न ईलाज हो पा रहा है। सरकार लगातार झूठे दावे करके जनता को गुमराह कर रही है। सही आंकड़ों को जनता से छिपाने में मीडिया भी बाजीगिरी कर रहा है। केजरीवाल सरकार से करोड़ों रुपए के विज्ञापन पाने की एवज में मीडिया सरकार को बचाने में लगा हुआ है । दिल्ली में केजरीवाल बेमिसाल। जनता का हुआ बुरा हाल। दिल्ली में जहां प्रति दस हजार की आबादी में11.64 लोग संक्रमित हैं वहीं महाराष्ट्र में 6.4 और तमिलनाडू में 3.6 लोग कोरोना से संक्रमित हैं। अब लगा लो हिसाब कि कौनसा राज्य संक्रमण के मामले में सबसे उपर है।अस्पताल सरकारी हो या प्राइवेट किसी में भी नहीं कोई सुनवाई। केजरीवाल से मोटी रकमों के विज्ञापन पाकर मीडिया भी नहीं दिखा रहा सही तस्वीर। मुफ्त बिजली के लालचियों ने सारी दिल्ली के लोगों को मौत के मुहाने पर पहुंचाया। अब भगवान ही मालिक है हमारा। दिल्ली के बेटे ने लोगों के इलाज़ की व्यवस्था करने की बजाए नए शमशान और कब्रिस्तान बनवाने शुरू कर दिए हैं। केजरीवाल सरकार के इस कदम से उसकी मानसिकता समझी जा सकती है कि आखिर वो क्या चाहता है?
 
दंगे के आरोपी ताहिर हुसैन का पक्ष लेनेवाले अमानातुल्लाह पर केजरीवाल चुप क्यों हैं?
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/गत फ़रवरी माह में देश की राजधानी दिल्ली में हुए दंगों के लिए जांच एजेंसियों ने निगम पार्षद ताहिर हुसैन को मास्टर माइंड ठहराते हुए कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। इन दंगों की साज़िश के मुख्य अभियुक्त ताहिर हुसैन अभी जेल में बंद हैं और उसकी कई गंभीर आपराधिक कृत्यों में संलिप्तता के प्रमाण जांच के दौरान जांच करनेवाली एजेंसियों को मिले हैं। इस बात का जवाब केजरीवाल को भी देना चाहिए कि उन्हीं की पार्टी का निगम पार्षद ताहिर हुसैन दंगों के आरोप में जेल में है और उनका विधायक अमानतुल्लाह दंगाई के पक्ष में बेतुकी बयानबाजी करके दिल्ली का माहौल खराब कैसे कररहा हैज्ञात हो कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान देश की राजधानी दिल्ली में हुए इन सुनियोजित दंगों में करोड़ों रुपए की चल-अचल सम्पत्ति को दंगाइयों ने जलाकर राख कर दिया था। इन दंगों में कई लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अब जब जांच एजेंसियों द्वारा कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल करके इन दंगों में ताहिर हुसैन को मुख्य आरोपी पाया है तो ओखला से आम आदमी पार्टी का विधायक अमानातुल्लाह खुलकर ताहिर के पक्ष में बयानबाजी करके कानून को चुनौती दे रहा है। सबसे अफसोस जनक पहलू यह है कि आम आदमी पार्टी के मुखिया और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इस पर चुप्पी साधे बैठे हैं। ताहिर हुसैन को खुला समर्थन देकर अमानातुल्लाह कह रहा है कि ताहिर हुसैन का कसूर सिर्फ उसका मुस्लिम होना है।
 
निरीह पशुओं के क्रूर हत्यारे शिक्षित से प्राणी मात्र पर दया रखने वालाअशिक्षित समाज उत्तम है।
हमारी सनातन संस्कृति प्राणी मात्र पर दया करने की शिक्षा हमको देती है। हम लोग चींटियों तक को भोजन देने वाली धार्मिक परिपाटी को माननेवाले लोग है। हम उस धार्मिक शिक्षा और संस्कृति के अनुयाई नहीं जो अपने कथित आराध्य को प्रसन्न करने के नाम पर अपने घर में पाले हुए हुए बेजुबान निरीह पशुओं की गर्दन पर छुरी फेरने को कुर्बानी की संज्ञा देती है। शिक्षा हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है, अगर हम शिक्षित होने के बावजूद अंधकार में डूबे हुए हैं तो, लानत है, ऐसी शिक्षा पर।
 
लड़कियां नहीं समझ पा रही लव जेहाद का सच ? प्रेमजाल में फसी छात्रा की हत्या का राज एक वर्ष बाद खुला।
पंजाब के लुधियाना की बी कॉम की छात्रा ने अपने घर से भागकर जिस अमन को हिन्दू समझकर प्रेम विवाह किया था वो असल में मुस्लिम शाकिब निकला।अपने प्रेमीअमन के साथ भागी लड़की अपने घर से लाखों रुपए के गहने भी लेकर आई थी।शाकिब ने अपनी असली पहचान छिपाकर अपना फर्जी हिन्दू नाम अमन बताकर लड़की को अपना शिकार बनाया था।जब लड़की को उसकी असलियत का पता तब चला जब शाकिब उसको अपने साथ में ईद पर अपने घर लेकर आया । जब लड़की को शाकिब की हकीकत पता चली तो दोनों में इसको लेकर झगड़ा भी हुआ था।शाकिब को यह अंदेशा हो गया कि अब यह लड़की भाग जाएगी और सच सभी को बता देगी तो वह कानूनी शिकंजे में जकड़ा जाएगा। इसी बात को सोचकर उसने लड़की की हत्या करने की खतरनाक साज़िश को अंजाम दिया जिसमें उसके यार दोस्त और परिवार वाले भी शामिल हो गए।
 
प्रचार पर करोड़ों रुपए बहाकर गिरगिट दिल्ली में लड़ रही कोरोना से जंग।परिणाम जनता भुगतेगी।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/ जिन मां-बाप का बेटा नालायक ,झूठा-मक्कार,निठल्ला,कामचोर और उनकी जीवन पूंजी से गुलछर्रे उड़ाना वाला हों तो उनकी मानसिक दशा क्या होगी?इसकाअंदाजा दिल्ली की जनता को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है।
 
पत्रकारिता तलवार की धार पर चलना है। पैसे के लिए झूठ-फरेब,चापलूसी करना तो दलाली है।
दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/पहले माना जाता था कि पत्रकार पैदा होता है बनाया नहीं जा सकता और पत्रकारिता करना तलवार की धार पर चलने के समान है। आज के युग में पत्रकार और पत्रकारिता के सभी मायने बदल चुके हैं।हिन्दी पत्रकारिता दिवस की मां सरस्वती के मानस पुत्रों को हार्दिक शुभकामनाएं।आज के ही दिन 30 मई,1826 को पं0 युगुल किशोर शुक्ल ने भारत में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड 'का प्रकाशन आरम्भ किया था। इसीलिए इस दिन को भारत में हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। पत्रकारिता की राह पर चलना किसी समय में तलवार की धार पर चलने के समान समझा जाता था और यह राह बहुत ही कष्टकारी होती थी। पुराने समय में पत्रकारों ने इस पेशे को राष्ट्र की सेवा में समर्पण भाव से ही अपनाया था।पत्रकार आज की तरह किसी विश्वविद्यालय या किसी मीडिया संस्थान में पैदा नहीं होते थे बल्कि उनमें जन्म से ही लेखन की कला होती थी। असहाय /कमजोर लोगों की पीड़ा की संवेदना से आहत होनेवाला हृदय ही उनके सीने में सदैव धड़कता रहता था और राष्ट्रप्रेम से भी ओत-प्रोत होता था।इसीलिए यह भी कहा जाता था कि पत्रकार बनता नहीं पैदा होता है और मरते दम तक कभी सेवानिवृत भी नहीं होता।
 
दिल्ली के बेटे ने छोड़ा लोगों को भगवान भरोसे। सरकार के निक्कमेपन से कोरोना ने धारण किया रौद्र रुप।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/देश की राजधानी में कोरोना ने अपना खुला तांडव मचाना शुरू कर दिया है।दिल्ली कोरोना संक्रमण के मामले में देश के सभी राज्यों को पछाड़ती हुई अब तीसरे स्थान पर पहुंच गई है। यहां प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। सिर्फ यह रिपोर्ट लिखे जाने के पूर्व के24 घंटों में कोरोना के1024 नए मरीज बढ़ गए जिससे दिल्ली के आनेवाले दिनों की भयावह स्थिति की कल्पना मात्र से ही रूह कांप जाती है।
 
हिंदुत्व विचारधारा को विकसित करने का श्रेय वीर सावरकर जी को ही जाता है।
दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में वीर सावरकर जी का नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए था परन्तु कांग्रेस ने हमेशा गांधी नेहरू के अलावा दूसरे आंदोलनकारियों को यह सम्मान नहीं दिया।उनके जीवन का अधिकांश भाग अंग्रेजी शासन में अंडमान निकोबारकी सेल्युलर जेल में ही बीता और अंग्रेजों ने उन्हें कारावास के दौरान बहुत अमानवीय यातनाएं भी दी। भारतीय इतिहास में सावरकर ऐसे इकलौते स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हें आजीवन कारावास की दो सजाएं मिली थीं।विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को ग्राम भागुर, जिला नासिक, बम्बई प्रेसीडेंसी में हुआ था। सावरकर जी की गिनती भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के सेनानियों में होती है। वह प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायःवीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है।उन्होंने कला स्नातक की उपाधि के साथ बार एट ला की शिक्षा लंदन से प्राप्त की थी।हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय श्री सावरकर जी को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया है।
 
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