21/11/2017
दिल्ली की चौपट होती कानून -व्यवस्था और अपराधियों के बढ़ते हौंसले।कौन संभालेगा गृहमंत्री जी ?

दिल्ली [अश्विनी भाटिया] देश की राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ समय से कानून -व्यवस्था बिगड़ती जा रही है। आये दिन लूटपाट ,चोरी और मारपीट की घटनाएं तो एक तरफ खुनी गैंगवार की घटनाएं का ग्राफ भी बहुत ऊपर की ओर चढ़ता जा रहा हैं। दिल्ली में पुलिस सीधे -सीधे उपराजयपाल के माध्यम से केंद्रीय गृहमंत्री के नियंत्रण में है।आश्चर्य की बात यह है कि गृहमत्री सहित देश का पूरा केंद्रीय शासन और प्रशासन भी दिल्ली में होने के बावजूद अपराधियों पर लगाम कसने में पुलिस तंत्र फ़ेल साबित हो रहा है। अगर देश की राजधानी में कानून -व्यवस्था चौपट हो रही है तो शेष देश के स्थिति कैसी होगी यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। देश की आधे से ज्यादा समस्याएं पुलिस की दूषित और भ्रष्ट कार्यप्रणाली की दें हैं।

 दिल्ली के पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक एक अनुभवी और कुशल पुलिस अधिकारी हैं और दिल्ली उनके लिए नई भी नहीं है. परन्तु इन सब के बावजूद कानून -व्यवस्था की स्थिति दयनीय होना चिंता का विषय है। आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि लोग न तो अपने घरों में सुरक्षित हैं और न सड़क पर। यहां तक कि दिल्ली की अदालतों के अंदर भी अपराधी बिना किसी भय के गोलीबारी करके जिसे चाहे मौत के घाट उतार देते हैं। रोहणी कोर्ट में अभी पिछले सप्ताह ही खून की होली खेली गयी है। इससे पहले कड़कड़डूमा कोर्ट में जज के सामने गोलीबारी की घटना को अपराधियों ने अंजाम दिया था और उसमें जज साहब बच गए लेकिन एक पुलिस कर्मी बेचारा अपना फ़र्ज़ निभाते हुए शहीद हो गया था। 

          पुलिस अधिकारी दिल्ली में आबादी के हिसाब से पुलिस बल कम होने की बात करके अपनी सारी नाकामी पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। यह ठीक है कि आबादी के हिसाब से दिल्ली में पुलिस बल कम है परन्तु जो बल मौजूद है वो कितनी ईमानदारी और जागरूकता से अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है यह सोचने का विषय है।पुलिस कार्यों के जानकार तो यहां तक कहते हैं कई जब तक थानों में तैनात छोटे पुलिस कर्मियों के सर से उच्च अधिकारियों की फटीक की तलवार नहीं हटेगी तब तक दिल्ली में कोई भी माई का लाल अपराधियों को काबू कर ही नहीं सकता। दूसरे पोस्टिंग में भाई -भतीजावाद और सुविधा शुल्क की बीमारी जब तक खत्म नहीं होगी दिल्ली सुरक्षित हो नहीं सकती। सूत्रों का कहना है कि आज हालात यह है कि थानों के अधिकांश थाना प्रमुखों को सटोरियों से कई -कई लाख की मंथली मिलती है और दूसरे आय के स्रोत अलग से हैं। इसीलिए थाना पाने के लिए कई निरीक्षक जुगाड़ लगाने में व्यस्त रहते हैं। जिनको थाना मिल जाता है वो अपनी कुर्सी पर बने  रहने के लिए किसी न किसी उच्च अधिकारी का वरदहस्त अपने ऊपर बनाये रखने के लिए उसकी सेवा में सैदेव ततपर रहता है और उसकी सारी सुख -सुविधा का ध्यान भी रखता है। पुलिस आयुक्त जितने मर्ज़ी दावे करते रहें परन्तु यह हकीकत सारी जनता जानती है कि कोई भी मकान पुलिसवालों की सेवा किये बिना बन नहीं सकता। सूत्रों का कहना है कि बिल्डर लॉबी बिल्डिंग बनाने से पहले ही अपने थाने के मुखिया को भेंट देता है और यह भेंट प्रति लेंटर के हिसाब से तय होती है। सम्पत्ति -विवाद में भी कई पुलिस अधिकारी पूरी रूचि लेते हैं और अपनी भेंट लेकर दूसरे पक्ष के हितों पर कुलहड़ा चलाकर सिविल मामला बोलकर कोर्ट जाने का मशविरा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। यह कुछ बीमारी हैं जो पुलिस का अधिक समय अपने ऊपर खर्च करवा लेती हैं शेष समय नेताओं की सुरक्षा में व्यतीत होता है बचा समय कोर्ट - कचहरियों में लग जाता है। तो ऐसे में यह सोचा जा सकता है कि बेचारी पुलिस कानून -व्यवस्था को बनाये रखने का समय कैसे निकाले ?दिल्ली क्या पुरे देश की पुलिस व्यवस्था में आमूल -चूल बदलाव की आवश्यकता है जब तक ऊपर के स्तर पर परिवर्तन नहीं आएगा तब तक जनता के बीच रहकर काम करनेवाले निम्न पुलिस कर्मियों के व्यवहार को नहीं बदला जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह अगर पुलिस को ही कुछ सुधार दें तो देश की बहुत सारी समस्याओं का निदान स्वत ही हो जायेगा। 

 



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