28/07/2020
राममंदिर से मुस्लिमों को दूर रखा जाए। हिन्दुओं ने दी है बड़ी कीमत। इसमें मुस्लिमों का क्या योगदान?

दिल्ली (अश्विनी भाटिया ) /भगवान श्री राम जी के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण हेतु आगामी5 अगस्त को भूमि पूजन के कार्यक्रम की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। कोरोना वायरस के चलते इस ऐतिहासिक समारोह में चाहते हुए भी बहुत से लोग शामिल नहीं हो पाएंगे। कार्यक्रम सीमित अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों द्वारा संपन्न होगा। सोशल मीडिया में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि कोई मुस्लिम भी पैदल राम जी की ननिहाल से मिट्टी लेकर आ रहा है जो पूजन में शामिल होगा और उसके द्वारा लाई गई मिट्टी नीव में डाली जाएगी। हमें यह समझ नहीं आ रहा कि सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने का पूरा बोझ यह हिन्दू अपने सिर पर ही क्यों लिए फिरता है? इस बात को पूरा विश्व जानता है कि हिन्दुओं ने अपने आराध्य श्री राम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिए पिछले5 सौ वर्ष संघर्ष किया और लाखों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी। जेहादी आतंकी मुस्लिमों ने इस पवित्र मन्दिर को बाबर के निर्देश पर 5 सौ वर्ष पूर्व ध्वस्त करके इस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कर लिया था। काफी संघर्षों के बाद1992 में हिन्दुओं बाबरी नामक कलंक को साफ कर दिया। कई दशकों तक कानूनी लड़ाई इस मंदिर के निर्माण हेतु हिन्दुओं ने लड़ी है और मुसलमानों ने हर कदम पर इसकी राह में बाधाएं ही उत्पन्न की। कुछ कट्टरपंथी आतंकी मुस्लिमों ने खून खराबा करने तक की धमकियां भी दी। मुस्लिमों को हिन्दू समाज ने कई बार इस बात का प्रस्ताव भी दिया कि वह इस पवित्र भूमि से अपना दावा छोड़ दें तो हिन्दू उनको दूसरी जगह अपने खर्चे से विशाल मस्जिद बनाकर दे देंगे। परंतु इस कट्टर मुस्लिम संप्रदाय ने कोई उदारता का परिचय नहीं दिया और हर संभव कोशिश की कि यह पवित्र भूमि हिन्दुओं को न मिले।अंत में देश के सर्वोच्च न्यायालय से हिन्दू पक्ष केस जीतकर मन्दिर निर्माण की राह प्रशस्त कर पाया है, इसमें मुस्लिमों का कोई भी योगदान नहीं है। जिस भी मुस्लिम को श्री राम में आस्था है और वह खुद को उनका भक्त समझता है तो वह सर्वप्रथम इस्लाम की त्याग कर सनातन धर्म में वापसी करे और प्रमाण दे कि उसे राम में आस्था है। जिस मजहब में अल्लाह के अलावा कोई दूसरा पूजनीय नहीं हो सकता और जो अपने अनुयायियों को मूर्तियों को तोड़ने का आदेश देता हो उसके अनुयायियों की आस्था मन्दिर में नहीं हो सकती। ऐसी मजहबी शिक्षा पर चलने वाले मुस्लिमों को मन्दिर निर्माण में शामिल करके इतिहास में जगह देने की किसी भी कोशिश को हिन्दू समाज सहन नहीं कर सकता। श्री राम मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी निभानेवाली समिति/न्यास और भूमिपूजन समारोह के आयोजकों को भूमि पूजन से मुस्लिमों को दूर रखना चाहिए। ज्यादा उदारता हमारी कमजोरी बनी। जिस मुस्लिम की राम में आस्था है तो पहले उसे हिन्दू बनाओ और फिर उसको भूमि पूजन में शामिल होने का अवसर दो। यह बात हिन्दू समुदाय सहन नहीं कर सकता कि मन्दिर मुक्ति संघर्ष में गोली खाएं हिन्दू, जेल जाए हिन्दू और भूमि पूजन में इतिहास में नाम दर्ज करवाएं मुस्लिम जिनका मन्दिर के आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। अब हमारे कुछ नेताओं और धर्माचार्यों को अगर हिन्दुओं को उदार साबित करने का पाखंड करना है तो हम सब उसके खिलाफ हैं। (वॉयस ऑफ भारत)



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