30/05/2020
पत्रकारिता तलवार की धार पर चलना है। पैसे के लिए झूठ-फरेब,चापलूसी करना तो दलाली है।

दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/पहले माना जाता था कि पत्रकार पैदा होता है बनाया नहीं जा सकता और पत्रकारिता करना तलवार की धार पर चलने के समान है। आज के युग में पत्रकार और पत्रकारिता के सभी मायने बदल चुके हैं।हिन्दी पत्रकारिता दिवस की मां सरस्वती के मानस पुत्रों को हार्दिक शुभकामनाएं।आज के ही दिन 30 मई,1826 को पं0 युगुल किशोर शुक्ल ने भारत में प्रथम हिन्दी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड 'का प्रकाशन आरम्भ किया था। इसीलिए इस दिन को भारत में हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। पत्रकारिता की राह पर चलना किसी समय में तलवार की धार पर चलने के समान समझा जाता था और यह राह बहुत ही कष्टकारी होती थी। पुराने समय में पत्रकारों ने इस पेशे को राष्ट्र की सेवा में समर्पण भाव से ही अपनाया था।पत्रकार आज की तरह किसी विश्वविद्यालय या किसी मीडिया संस्थान में पैदा नहीं होते थे बल्कि उनमें जन्म से ही लेखन की कला होती थी। असहाय /कमजोर लोगों की पीड़ा की संवेदना से आहत होनेवाला हृदय ही उनके सीने में सदैव धड़कता रहता था और राष्ट्रप्रेम से भी ओत-प्रोत होता था।इसीलिए यह भी कहा जाता था कि पत्रकार बनता नहीं पैदा होता है और मरते दम तक कभी सेवानिवृत भी नहीं होता।

पहले के समय में  पत्रकारिता घर फूंक तमाशा देखना से अधिक कुछ नहीं होता था। उसको हमेशा जीवन के भौतिक सुख के अभाव में जीना पड़ता था और परिवार भी गुर्बत में ही तमाम जीवन यापन करता था। सत्य के साथ चलने और समाज के असहाय कमजोर लोगों के पक्ष में डटकर खड़े रहना ही उसको संपन्न लोगों और शासकों की आंख की किरकिरी बना देता था। देश के स्वाधीनता संग्राम में समाज को जागरूक बनाने और राष्ट्रीय भावना को उभारने में सबसे अधिक योगदान हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाई पत्रकारिता का रहा है उसमे भी लघु समझे जानेवाले समाचार पत्रों का रहा है।अधिकांश कथित बडे़ समाचार पत्र पराधीन भारत में भी शासकों के तलवे चाटते थे और स्वाधीन भारत में भी उनको इसी का स्वाद भाता है। पत्रकारिता धर्म को पूरी निष्ठा से निभाने के कारण बहुत से सरस्वती पुत्रों को सरकारी और समाज के दबंगों के प्रकोप का भाजन भी बनना पड़ता है और कई बार तो अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। 
     आज के युग की पत्रकारिता में भड़वे और दलालों ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। असहाय और कमजोर वर्ग की पीड़ा से उद्वेलित न होने वाले पत्रकार नहीं दलाल है जिनके सीने में न तो संवेदनशील दिल है और न ही वह इस पेशे में सेवा भाव से आए हैं। वह तो बड़े-बड़े नामी मीडिया संस्थानों से पत्रकारिता की डिग्रियां लेकर इस धंधे में उतरते है।सरकारी सेवाएं, भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाने का उद्देश्य लेकर ही वह गैलमर भरे पत्रकारिता का जॉब करने आते हैं। आज अपने काले- कारनामों को पत्रकारिता की आड़ में छुपाने वाले माफिया किस्म के शातिर लोग भी बड़ी संख्या में पत्रकार होने का लेवल अपने माथे पर लगाए समाज में अपना प्रभाव बनाए देखे जा सकते हैं। आज के बहुत से कथित पत्रकार पैसा कमाने के लिए भ्रष्ट अधिकारियो की  दलाली करने में अपनी योग्यता समझते हैं। यह लोग नैतिक रूप से इतने नीचे गिर चुके हैं कि पैसा पाने की लालसा में यह राष्ट्र और समाज विरोधी शक्तियों से भागीदारी करने में लेशमात्र भी लज्जित नहीं होते। इस काम में आज का चकाचौंध और ग्लैमर वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे आगे निकल चुका है जो समाचार की खोज नहीं बल्कि उसको सनसनीखेज बनाने में अधिक रुचि ले रहा हैं ताकि उसके दर्शकों की संख्या अधिक बढ़ सके। इंटरनेट के इस दौर में सोसल मीडिया ने भी एक अच्छा खासा स्थान बना लिया है और इससे आम आदमी को भी अपने दर्द और समस्या को बुलंद तरीके से उठाने का एक प्लेटफार्म उपलब्ध हो गया है।मैं अपनी ओर से पत्रकारिता के सत्य धर्म को निभाते हुए अब तक बलिदान हुए लेखनी के सिपाहियों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और आशा करता हूं कि पत्रकारिता पुन: भड़वे और दलाल प्रवृति से मुक्त होकर समाज और राष्ट्र सेवा में समर्पित होगी।



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