28/05/2020
हिंदुत्व विचारधारा को विकसित करने का श्रेय वीर सावरकर जी को ही जाता है।

दिल्ली (अश्विनी भाटिया)/भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में वीर सावरकर जी का नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए था परन्तु कांग्रेस ने हमेशा गांधी नेहरू के अलावा दूसरे आंदोलनकारियों को यह सम्मान नहीं दिया।उनके जीवन का अधिकांश भाग अंग्रेजी शासन में अंडमान निकोबारकी सेल्युलर जेल में ही बीता और अंग्रेजों ने उन्हें कारावास के दौरान बहुत अमानवीय यातनाएं भी दी। भारतीय इतिहास में सावरकर ऐसे इकलौते स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हें आजीवन कारावास की दो सजाएं मिली थीं।विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को ग्राम भागुर, जिला नासिक, बम्बई प्रेसीडेंसी में हुआ था। सावरकर जी की गिनती भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के सेनानियों में होती है। वह प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायःवीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है।उन्होंने कला स्नातक की उपाधि के साथ बार एट ला की शिक्षा लंदन से प्राप्त की थी।हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय श्री सावरकर जी को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया है।

उन्होंने 1857 के प्रथम सवतंत्रता समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था।वे एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं को हिंदू धर्म में वापस लौटाने हेतु सतत प्रयास किये एवं आंदोलन चलाये। सावरकर ने भारत के एक राष्ट्र के रूप में एक सामूहिक "हिंदू" पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा। उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व थे। सावरकर एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे ।1921में वे जेल से मुक्त होकर स्वदेश लौटे और फिर 3 साल जेल भोगी। जेल में उन्होंने हिंदुत्व पर शोध ग्रन्थ लिखा। मार्च, 1925 में उनकी भॆंट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, डॉ॰ हेडगेवार से हुई।फरवरी, 1931 में इनके प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई,जो सभी हिन्दुओं के लिए समान रूप से खुला था।सावरकर ने बम्बई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता भी की और वे हिन्दुओं में प्रचलित छुआछात के भी सख्त विरोधी रहे।1937 से वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कई वर्षों तक अध्यक्ष भी रहे।22 जून1941 को उनकी भेंट नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई।सावरकर जीवन भर अखण्ड भारत के पक्षधर रहे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के माध्यमों के बारे में गान्धी और सावरकर का एकदम अलग दृष्टिकोण था। सावरकर भारत का विभाजन करके पाकिस्तान बनाए जाने के घोर विरोधी रहे। सन 1948 में हुई महात्मा गांधी की हत्या की साज़िश के आरोप में भी उनको आजाद भारत की सरकार ने गिरफ्तार किया था। बाद में आरोप साबित न होने पर उन्हें कोर्ट से आरोप मुक्ति मिली। उनकी मृत्यु 28 फ़रवरी,1966 को हुई।उनकी हिंदूवादी विचारधारा और अखंड भारत की कल्पना की घोर विरोधी होने के कारण, कांग्रेस उन पर हमेशा यही आरोप लगाती रही है कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी, परन्तु सरकार के पास इसका कोई लिखित अभिलेख मौजूद नहीं है। इस बात की जानकारी भारत सरकार देश की संसद में भी दे चुकी है।हम ऐसे महाबलिदानी स्वाधीनता संग्राम के सेनानी और अखंड भारत के प्रबल पक्षकार वीर सावरकर जी के चरणों में पुन: अपना शत- शत नमन करते हैं।



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