14/04/2020
बाबा साहब के नाम पर सिर्फ वोट बैंक और लाभ लेनेवाले सच्चे अबेड़कर वादी नहीं हो सकते।

दिल्ली(अश्विनी भाटिया)/बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जयंती की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। बाबा साहब का नाम ले -लेकर भारत के राजनीतिक दलों ने देश की आजादी के बाद से ही अपना वोट बैंक बनायाऔर सफल भी रहे। बाबा साहब का नाम तो सभी ने लिया ,परन्तु उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता किसी ने नहीं समझी। बाबा साहब ने समाज के दलितों/ वंचितों और अस्पृश्यता के शिकार वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था संविधान में करवाई। यह अस्थाई व्यवस्था 10 वर्षों के लिए की गई थी जो सरकारों के वोट पाने का माध्यम बना दी गई और इस अवधि को बढ़ाते -बढ़ाते आज 70 वर्ष से भीअधिक हो गए मगर आज भी सभी एस सी एस टी मुख्यधारा में नहीं आ पाए क्यों?

आज स्थिति यह बन चुकी  हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में लाभ लेकर सम्पन्न बन चुके एस सी /एस टी के लोग भी इसको अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ बैठे हैं। वह लोग इस आरक्षण को छोड़ने को तैयार नहीं हैं ताकि उन्ही के वंचित बंधु -बांधवों को भी इसका लाभ मिल सके। राजनैतिक दलों और सरकारों को भी इस व्यवस्था को बनाए रखने में ही अपना हित नजर आता है। आज समाजिक स्थिति यह बना दी गई है कि इस अस्थाई व्यवस्था को समाप्त करना तो दूर ,इसके पुनरावलोकन की बात करने मात्र से ही समाज उबलने लगता है। क्यों नहीं इस व्यवस्था का विश्लेषण होना चाहिए और इसका लाभ ले चुके परिवारों को अपने ही अन्य भाइयों के पक्ष में छोड़ देना चाहिए? जिनका जीवन स्तर ऊपर उठ चुका है उन्हें बाकी दबे कुचले अपने जाति बंधुओं के बारे मेंभी सोचना चाहिए। यही बाबा साहब का इस आरक्षण की अस्थाई व्यवस्था को लागू करवाने का उद्देश्य भी रहा होगा ।परन्तु न तो इसका लाभ लेने वाले लोग ही अब इस बात को मानने को तैयार हैं और न ही इसके लाभ से वंचित लोग भी इस की सच्चाई को समझना चाहते है। बाबा साहब के सपनों का भारत तो वह है जिसमें समाज का हर वर्ग देश की मुख्य धारा में स्वयं को शामिल करके, देश को मजबूत बनाने की ओर अग्रसर हो। नाकि कुछ सम्पन्न परिवार आरक्षण पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार जमाकर अपने ही जाति बन्धुओं के हितों को नजरंदाज करके समाज के दूसरे वर्गों में भी वैमनस्यता को बढ़ाने का काम करें। (वॉयस ऑफ भारत)



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