20/02/2016
खट्टर सरकार हिंसक जाट आरक्षण आंदोलन का अब कड़ाई से करेगी दमन ?

हरियाणा में जिस बात की आशंका थी वही हो गई आख़िरकार जाटों के आरक्षण आंदोलन ने हिंसात्मक रूप धारण कर ही लिया है और पूरा हरियाणा धूं -धूं करके जलने लगा है। इस बात की आशंका हमने पहले ही व्यक्त की थी और 18 फ़रवरी को ही अपनी एक रिपोर्ट में आंदोलनकारियों से अपील भी की थी कि यह टाइम आंदोलन के लिए उचित नहीं है क्योंकि इस समय देश में बैठे बहुत से देशद्रोही विदेशी आकाओं के निर्देश पर देश के अधिकांश हिस्सों में उपद्रव फ़ैलाने की फ़िराक में हैं। इसकी संभावना जेएनयू की घटना के बाद और बढ़ चुकी है। और हमने यह आशंका भी व्यक्त की थी कि यह अराजक तत्व आंदोलन में घुसकर हिंसा फैला सकते हैं जिसके कारण यह आंदोलन दागदार हो सकता है परन्तु आंदोलनकारियों को यह अपील रास नहीं आई और आख़िरकार उनके आंदोलन को अराजक तत्वों ने हाईजैक कर ही लिया है।

अब पुरे राज्य में हिंसा फ़ैल चुकी है और मजबूरन सरकार को सेना को भी बुलाना पड़ा है। आगजनी और गोली चलने की घटना भी रोहतक में घट चुकी हैजिसमें बीएसफ के एक जवान के जख्मी होने और कुछ अन्य लोगों की मौत होने की भी खबर है। अब यह पूरी तरह से निश्चित हो गया है कि प्रशासन को न चाहते हुए भी इस आंदोलन का दमन ताकत से करना ही पड़ेगा क्योंकि कानून व्यवस्था को किसी भी तरह से बनाये रखना सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है। किसी भी व्यक्ति या समुदाय को अपनी मांग के लिए आंदोलन करने का अधिकार लोकतंत्र में है लेकिन किसी को भी हिंसा करने ,आगजनी करने और लूटपाट करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। अफ़सोस की बात है कि हरियाणा में इस समय जाट आरक्षण आंदोलन हिंसात्मक हो चुका है और पुरे प्रदेश में आगजनी ,हिंसा और लूटपाट का नंगा नाच असमाजिक तत्वों द्वारा किया जा रहा है। इस आंदोलन की हिंसा की भेंट करोड़ों रूपये की सरकारी और गैरसरकारी सम्पति आग में जलाकर स्वाहा कर दी गई है जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से आंदोलनकारियों की ही मानी जाएगी ।यह सर्वोच्च न्यायलय का स्पष्ट निर्देश सरकारों को है कि किसी भी आंदोलन के दौरान हुई सरकारी और गैरसरकारी सम्पति के नुकसान की भरपाई आंदोलनकारियों से करवाई जाए। हरियाणा सरकार को अब इस हिंसा को पूरी ताकत से काबू में करना चाहिए क्योंकि किसी भी आंदोलन को जब हिंसक तत्व अपने कब्ज़े में कर लें तो उसका दमन जरूरी होता है यह दमन सिर्फ और सिर्फ कड़ाई बरत कर ही किया जा सकता है और अब यह समय आ गया है। अगर हरियाणा सरकार अब भी नरमी बरतती है तो वो आम नागरिक के जनोमाल की सुरक्षा करने में असफल मानी जाएगी । आंदोलन का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि सड़कों को अवरुद्ध कर दिया जाये, रेल की पटरियों पर कब्ज़ा करके सरकारी और निजी सम्पति को तहस -नहस कर दिया जाए। इस बात को जाटों को भी समझना चाहिए कि वो अपनी मांग के लिए दूसरे लोगों को परेशान करेंगे तो उन्हें कुछ हांसिल नहीं होनेवाला। यह आंदोलन अब उपद्रव में तब्दील हो चूका है और इसको नहीं काबू किया गया तो इसमें सभी का ही नुकसान होना निश्चित है। हमें तो यह प्रतीत होता है कि इस आंदोलन के हिंसात्मक होने के पीछे एक और फैक्टर भी काम कर रहा है और वो यह है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर किसी गैरजाट समुदाय के व्यक्ति का बैठना और यह बात कई जातिवादी लोगों के गले से नीचे नहीं उतरना। इन जातिवादी लोगों के दिलों में इस बात की टीस है कि पंजाबी मनोहरलाल खट्टर मुख्यमंत्री के पद पर क्यों बैठ गए हैं ? जब से हरियाणा राज्य [1966 ]बना है तब से अधिकांश समय जाट समुदाय का व्यक्ति ही इस प्रदेश का मुख्यमंत्री बना है। और आश्चर्य का विषय यह है कि इस सब के बावजूद जाट अपने पिछड़ेपन से छुटकारा पाने को तैयार नहीं हैं क्यों?इस परम्परा को कांग्रेस ने ही शुरू किया था जिससे प्रदेश की दूसरी जातियों में रोष भी बना रहता था । राज्य में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत से सरकार आई और मोदी जी ने सीएम के पद पर पंजाबी समुदाय के मनोहर लाल खट्टर को आसीन करवाकर प्रदेश के दूसरे समुदायों को भी यह संदेश दिया कि राज्य में उनकी भी बराबर की भागीदारी है। लेकिन जाट समुदाय को यह बात अभी तक हज़म नहीं होती दिखाई देती और वो हरियाणा पर सिर्फ और सिर्फ अपना एकाधिकार समझते हैं ,जिसका रोष उनके दिलों में पनपता रहा और इस आंदोलन की आढ़ में इस रोष को भी बहुत से लोग हिंसा फैलाकर व्यक्त करने का सुनहरा अवसर मान बैठे हैं। सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इस आंदोलन को हिंसक बनाने में कई विपक्षी और सत्तापक्ष के जाट नेताओं का भी परदे के पीछे से समर्थन मिला हुआ है। इन लोगों का एक ही लक्ष्य है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को किसी भी तरह से फेल किया जाये। अब देखना यह है कि खट्टर किस तरह से इस राजनैतिक चक्रव्यहू से कामयाब होकर निकल पाते हैं। [अश्विनी भाटिया ]



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