09/01/2016
सरकारी षड्यंत्र का शिकार रही है हिंदी। भारत कब तक रहेगा विदेशी भाषा अंग्रेजी का गुलाम ?

भारत को आज़ाद हुए आज 68 वर्ष हो चुके हैं , लेकिन आज भी हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी विदेशी अंग्रेजी के सामने बौनी बनी हुयी है।

देश की आज़ादी के बाद जिन नेताओं ने भारत की बागडौर संभाली उनमें से अधिकांश विदेशों में पढ़े -लिखे थे और उनकी सोच भी अंग्रेजी ही थी।अंग्रेज़ों की भांति ही इन नेताओं ने भी हिंदी को हेय समझा और अंगेज़ी को उच्च कुलीन वर्ग के सम्मान की भाषा माना। अपनी इसी दूषित सोच के कारण उन्होंने भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद होने के बाद भी हिंदी भाषा को वह सम्मान नहीं दिया जो एक राष्ट्रभाषा को मिलना चाहिए था।अंग्रेज़ों के इन मानस पुत्रों ने हिंदी को जानबूझ कर षड्यंत्र का शिकार बनाया क्योंकि यह शासक वर्ग नहीं चाहता था कि शासितों और शासकों की भाषा एक ही हो। ऐसी कारण हमें यह तो बताया गया कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी है और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी है , लेकिन हकीकत कुछ और ही थी जिसको आम जनमानस से छुपाया गया।

आम आदमी के बच्चे जब हिंदी माध्यम से शिक्षित होकर रोजगार पाने के लिए निकले तो वहां अंग्रेजी ने उनको एक तरफ धकेल दिया ,अब हकीकत उन भोलेभाले लोगों के सामने आ गई कि भारत अंग्रेज़ों के शासन से बेशक आज़ाद हो गया है परन्तु उनकी भाषा अंगेज़ी की जंजीरों में अब भी जकड़ा हुआ हैऔर देश की  राष्ट्रभाषा हिंदी नहीं अंग्रेजी है। देश के कर्णधारों ने सोची -समझी साजिश के तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले साधारण जनता के बच्चों को हिंदी भाषा पढ़ाने की नीति बनाई और अपने बच्चों को हिंदी से दूर रखकर कान्वेंट स्कूलों में अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी ताकि आगे चलकर वह भी उनकी ही तरह देश पर अपना वर्चस्व बनाए रखे और शासक की भूमिका निभाते रहें।सबसे अफ़सोस की बात यह है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने हिंदी को इतना दयनीय बना दिया कि हिंदी परिवेश में पले  -बढ़े और उच्च शिक्षित लोगों को भी मामूली कामचलाऊ अंग्रेजी बोलने वालों के सम्मुख बौना बनाकर खड़ा कर दिया गया।शिक्षा नीति निर्धारकों ने जहां हिंदी सिखने वालों के लिए शुरुवात ही \'क से कबूतर ,ख से खरगोश और ग से गधा \'सिखाकर करवाई वहीं   अंग्रेजी की शुरुवात ही \'A से Apple और B से Boy और C से Cat \' करके हिंदी को अंग्रेजी की तुलना में हीन बना दिया और हिंदी सिखने वाले को बौना।आज पूरे देश के शासन -प्रशासन के दफ्तरों से लेकर कोर्ट -कचहरी तक सब ओर हिंदी नदारद है और अंग्रेजी का वर्चस्व ही कायम  है। यह सोचने की बात है कि अगर भारत के शासन को अंग्रेजी तौर -तरीकों से ही चलाना था तो आम जनता को हिंदी का जाप क्यों रटाया गया ? शासकों ने क्यों अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में अघोषित रूप से आज तक लागु किया हुआ है?  क्या यह आम आदमी के साथ सरकारी षड्यंत्र नहीं है कि राग गाया जाये हिंदी का और सारा काम चलाया जाये अंग्रेजी में ,ऐसा क्यों, क्या इसके पीछे कोई षड्यंत्र तो नहीं है ? इसका  कारण यही है कि शासक नहीं चाहते कि शासित भी उन्हीं की तरह अंग्रेजी पढ़कर उच्च पदों पर आसीन हो जाएं। जनता को हिंदी में उलझाकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करके नेताओं ने सभी सरकारी -गैर सरकारी उच्च पदों पर आसीन करके सभी सत्ता सोपानों पर अधिपत्य जमा लिया है। आज भी देश के उच्च और सर्वोच्य न्यायालय  में सिर्फ अंग्रेजी में ही न्याय मिल सकता है , हिंदी या किसी अन्य भाषा में नहीं। यह है हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी की वास्तविक स्थिति। उच्च न्यायालयों में अगर कोई राष्ट्रभाषा हिंदी में अपनी फरियाद रखना चाहे तो उसको अंग्रेजी का अनुवाद भी देना अनिवार्य है क्योंकि हमारी न्याय की मूर्तियां हिंदी नहीं अंग्रेजी परिवेश में पली -बढ़ी हैं और उनकी सोचने की शक्ति अंग्रेजी में ही अधिक प्रखर होती है।सरकार भी साल के  365 दिन में से मात्र 14 दिन का एक पखवाड़ा हिंदी -दिवस के नाम पर मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने की लीक पीटती आ रही है। कितनेअफ़सोस की बात है कि राष्ट्रभाषा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करके सिर्फ खानापूर्ति ही की जाती है और व्यवहार में गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी को अहमियत दी जाती है। आज जब से नरेंद्र मोदी की सरकार देश की सत्ता पर काबिज़ हुई है तब से राष्ट्रभाषा हिंदी को उसका सम्मान देने की चर्चा जोरों पर चल पड़ी है और सरकार इस पर कुछ गंभीर होती भी  प्रतीत हो रही है। अगर हमारी सरकार वास्तव में ही भारत को विश्व में महान राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का सपना अपने मन में संजो चुकी है तो उसको पूरी ताकत से सर्वप्रथम राष्ट्र भाषा हिंदी को जनमानस की भाषा से शासन -प्रशासन की सरकारी भाषा बनाने का कार्य करना होगा , ऐसा करने के बाद ही भारत महान बन सकता है।यह प्रमाण हमारे सामने हैं कि विश्व के वही  देश आज महान और शक्तिशाली बन पाएं हैं  जिनकी अपनी राष्ट्रभाषा है। आज विश्व का  कोई भी ऐसा विकसित देश चाहे वह जापान ,चीन ,रूस ,जर्मनी ही क्यों न हो इनको देखें तो यही साबित होता है कि इन देशों ने अपनी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाकर अपने देश को महान देशों की कतार में खड़ा किया न कि  गुलामी की प्रतीक किसी विदेशी भाषा को अपनी राष्ट्रभाषा के रूप में अघोषित रूप से जनता पर थोपकर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश का जनमानस  यह अपेक्षा करता है और यह विश्वास भी है कि वह देश के जनमानस में रची -बसी  हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी को उसका उचित गौरव दिलाकर हिंदी को दीन  -हीन  नहीं बना रहने दें। हिंदी को शासन -प्रशासन के कामकाज की सरकारी भाषा बनवाएं और देश की जनता को उन्हीं की भाषा में न्यायालयों से  भी न्याय दिलाने की व्यवस्था प्रदान करें। ऐसा होने पर हमें फिर हिंदी -दिवस मनाने की नहीं अपितु अंग्रेजी के प्रेमियों को अंग्रेजी -दिवस मनाने की जरुरत पड़ेगी। क्योंकि राष्ट्रभाषा हिंदी तो  हर पल हर स्थान पर उपस्थित होगी और इस भाषा को आत्मसात करके भारत के लोग स्वयं को गौरान्वित तो महसूस करेंगे ही साथ ही हमारा देश भी विश्व पटल पर अपनी राष्ट्रभाषा के ताज को पहनकर महान और स्वाभिमानी स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना सकेगा। जय हिन्द ,जय हिंदी। 



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सरकारी षड्यंत्र का शिकार रही है हिंदी। भारत कब तक रहेगा विदेशी भाषा अंग्रेजी का गुलाम ?

भारत को आज़ाद हुए आज 68 वर्ष हो चुके हैं , लेकिन आज भी हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी विदेशी अंग्रेजी के सामने बौनी बनी हुयी है।